“सिद्धपीठ उच्चैठ भगवती”

१७ पुष २०२६, बिहीबार ००:००
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आभा झा।                       

# यात्रा (भगवती स्थान उचैठ )#
मिथिलाक पवित्र भगवती स्थान उचैठ मधुबनी जिला के बेनीपट्टी अनुमंडल सँ मात्र चारि किलोमीटर दरी पर पश्चिम दिशा में स्थित अछि। ई स्थान मिथिला में एक प्रसिद्ध सिद्धपीठ के नाम सँ जानल जाइत अछि। भगवती मंदिर के गर्भगृह में माँ दुर्गा सिंह पर कमल के आसन पर विराजमान छथि। दुर्गा माँ खाली कंधा तक देखाइ छथि,कंधा के ऊपर हुनकर सिर नहिं छैन। ताहि दुवारे हुनका छिन्नमस्तिका दुर्गा सेहो कहल जाइत अछि। मंदिर के लग में एकटा बहुत पैघ
शमशान अछि,जतय बड्ड संख्या में तन्त्र साधक साधना में लीन रहैत छथि। अहि स्थान पर साधक जे मनोकामना सँ माँ दुर्गा के दर्शन करैत छथि,ओ ओतय सँ खाली हाथ वापस नहिं अबैत छथि। कहल जाइत अछि कि भगवान राम जनकपुर के यात्रा के समय एतय रूकल छलाह।
:महाकवि कालिदास के देने रहधिन वरदान: दुर्गा मंदिर सँ पूर्व दिशा में एक संस्कृत पाठशाला छल। संस्कृत पाठशाला आर मंदिर के बीच एक नदी बहैत छल। कालिदास एक महामूर्ख व्यक्ति छलाह। हुनकर विवाह राजकुमारी विद्योतमा सँ छल द्वारा करा देल गेल रहनि। विद्योतमा परम विदुषी महिला छलीह। ओ ई नहिं जानैत छलीह कि कालिदास महामूर्ख छथि। जखन पता चललनि तखन ओ कालिदास के तिरस्कार केलनि आर कहलखिन कि जाबे तक हुनका संस्कृत के ज्ञान नहिं भ जेतेन ओ घर वापस नहिं आबैथ। कालिदास अपन पत्नी सँ अपमानित भ उचैठ भगवती स्थान आबि गेला आर ओतय के आवासीय संस्कृत पाठशाला में रसोइया के काज करय लगला। समय बीतैत गेल। किछ दिनक बाद वर्षा ऋतु शुरू भ गेल। एक दिन घनघोर वर्षा के कारण नदी में बाढ़ि आबि गेल। नदी में पइन के धार तेज गति सँ बहय लागल। सांझ होइ वाला छल। मंदिर के साफ-सफाई,पूजा-पाठ,धूप-दीप,आरती सब व्यवस्था पाठशाला के छात्र करैत छलाह। सांझ भ गेल छल। मंदिर में दीप सेहो जराबय के छल,मुदा भयंकर वर्षा आर नदी में तेज धार के कारण ओ सब मंदिर जाई में असमर्थ भ गेला। सब छात्र मूर्ख कालिदास के मंदिर में दीप जराबय लेल कहलकेन। कालिदास मंदिर जाय लेल तैयार भ गेला। छात्र सब कालिदास सँ कहलखिन कि मंदिर में दीप जरेला के बाद कोनो निशान लगेनाइ नहिं बिसरब। कालिदास मंदिर जाय लेल बिना किछ सोचने नदी में कुदि गेला। कोनो तरहें तैरैत,डुबैत मंदिर पहुंचला। मंदिर के भीतर गेला आर दीप जरेला। ओ मोने मोन सोचला कि निशान लगबै लेल किछ अनने नहिं छी। सोचिते छलाह कि हुनकर नजरि दीप जरय वाला स्थान पर पड़लनि। जरय वाला स्थान पर कारी भ गेल छल। ओ सोचला अहि सँ निशान लगा देब। फेर ओ अपन दायां हाथ कारी पर रगड़ला। मंदिर के चारू कात सब जगह कारी निशान पहिने सँ लागल छल। निशान लगाब लेल कोनो स्थान नहिं देख ओ सोचला कियैक नहिं भगवती के मुखमंडल पर ही निशान लगा देल जाय कियैक कि ओतय पहिने सँ कोनो निशान नहिं लागल छल। ई सोचि कऽ ओ अपन दायां हाथ भगवती के मुखमंडल दिस निशान लगाबै लेल बढ़ेला तखने भगवती प्रकट भ कालिदास के हाथ पकड़ि कऽ कहय लगली अरे महामूर्ख अहाँ के निशान लगाबै लेल आर कोनो जगह नहिं भेटल। हम अहाँ पर बहुत प्रसन्न छी जे अहाँ अहि विकराल समय में नदी पार करि कऽ दीप जराबै लेल एलहुँ। मांगु कोनो वर हमरा सँ। कालिदास भगवती के वचन के सुनि सोचय लगला कि मुर्ख होइ के कारण ही अपन पत्नी सँ तिरस्कृत छी। अतः ओ भगवती सँ विद्या के याचना केलनि। माँ तथास्तु कहैत कहलखिन आइ राति भरि में जतेक पुस्तक अहाँ छु सकैत छी छु लिय सब पुस्तक अहाँ के याद भ जायत। यैह कहैत माँ अंतर्ध्यान भ गेलखिन। पुस्तक स्पर्श करिते माँ के कृपा सँ सब पुस्तक कंठस्थ भ गेलनि। ओ काव्य पुस्तक सेहो लिखलनि।यथा कुमार संभव,रघुवंश आर मेघदूत।
जय माँ भगवती उचैठ 🙏🙏

आभा झा
गाजियाबाद