“यात्रा : कपिलेश्वर स्थान के”

१७ पुष २०२६, बिहीबार ००:००
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अखिलेश कुमार मिश्रा।                     

कपिलेश्वर यात्रा-एक स्मृति
चलु तहन हम आई अहाँ सँभकें अप्पन बचपनक एक झलफलाइत यादक सँग कपिलेश्वर धामक यात्रा पर लs चली। कपिलेश्वर धाम मधुबनी शहर सँ करीब आठ किलोमीटर पश्चिम आ रहिका सँ करीब चारि किलोमीटर दक्षिण अवस्थित अछि। हम अप्पन बाल्यकाल सँ ही रहिका में रहैत रही। ई अहि यात्राक वर्णन अछि जाहि समय हम्मर उम्र शायद आठ नौ साल रहल होइत। कियैक तs हमरा वर्ष बिल्कुले नै याद अछि, बस घटना सभ याद अछि, वर्ष भs सकैत अछि जे 1980 या 81 छल होयत।
एक दिन पहिले पता लागल जे काल्हि शिवरात्रि अछि आ कपिलेश्वर मेला जायब। मेला के बारे में सोचिये कs कथि लेल नींद होयत। काल्हि नीक आ धोल कपड़ा पहिरब, से सिरमा में ही राखि लेलौं। ओना कपड़ाक संख्या बेसी नै रहैत छल, बस एक दू टा शर्ट आ एक दू टा हाफ पैंट। आयरन-ताईरन के के पुछैत अछि। भोरे भोर सिरमा में राखल पेंट शर्ट पजिया उठि गेलौं। अन्य क्तज सभ कs झटपट स्नान। मुदा पता लागल जे कपिलेश्वर देरी सँ जैब मतलब दुपहर में भोजन कs कs।
दुपहरिया में यात्रा आरम्भ लेल रहिका चौक सँ रिक्सा ऎल। रिक्सा पर हम्मर माँ, छोटका भाइजी आ बड़की बहिन बैसल आ हम अप्पन पिताजीक साइकिल के अगिलका डंडा पर जाहि में तौलिया लपेटि देल गेल रहै। हमरा लेल ओ साइकिल के डंडा पर बैसल यात्रा कुनो हेलीकॉप्टर के यात्रा सँ कम नै छल। मौसम तेहने, ने जाड़ आ ने गर्मी। साइकिल पर बैसल रही कि एक कागज के घिरनी बाला देखलौं, बाबूजी ओ किनि देलाह। एक हाथ में लs कs राखने रही, साइकिल के गति के अनुसार ही ओहो नाचय। ई देखि आनंदक सीमा की कहु। ककरौल पहुँचैत पहुँचैत एक बाँसुरी बाला सेहो देखलौं, बाबूजी हम्मर इच्छा जानि ओहो खरीद देलाइथि। हम तs आब पी पी कs कs अनघोल मचा देलौं। अगिला रिक्सा पर हम्मर माँ के कोरा में बैसल हम्मर छोट बहिन (ओ करीब तीन चारि सालक छल) कानs लागल। तs हम बाँसुरी ओकरे दs देलौं। हम तैयौ खुश। हम्मर सभक यात्रा में आगा रिक्सा पर हम्मर बहिन बाँसुरी के बजबैत आ पाँछा साइकिल पर हम घिरनी नाचबैत, अलग समां बाँधि गेल छल। रास्ता में टैर गाड़ी पर सेहो डंफ़ा बजबैत सभ अबीर लगेने फागु गबैत ग्रामीनक टोली सभ, की कहु एखनो याद कs कs रोमांचित भs जाइत छी। हुनकर सभ एक फागु “बमभोले हो लाल कहमा रंगोले पागरिया” एखनो याद अछि।
हम सब कपिलेश्वर के पोखड़ि के घाट लग पहुंच गेलौं। ओतुका भीड़ आ कोलाहल के अलग रोमांच छल। पैर में झुनझुनी भरि गेल रहै। कनि देर साइकिल सँ उतरि ओ ठीक केलौं। बाबूजी छोटका भाइजी कें आठ आना पाई हमरा लेल आ आठ आना हुनका लेल दs कs हमरा मेला घुमा दै लेल कहलखिन्ह। भाइजी हम्मर बचपने सँ बड्ड ठेकनगर। हमरा सँ करीब सबा तीन सालक पैघ। हम्मर छोट बहिन माँ बाबूजी सँग, आ हम दुनू भाई अलग। हम कथि लेल मंदिर जैब पूजा में, हम्मर मोन तs मेला घूमs लेल उडल रहै। भाइजी पुछलाह जे की खरीद दियौ, तs मोने स्थिर नै होइत छल जे की ली। संयोग सँ एक सरबत बाला पर नजरि गेल। प्यास तs लागले रहै, लाल रंगक सरबत एक गिलास लेलौं। पता नै ओहि में रूहअफजा रहै की खाली रंग, पी कs बड्ड तृप्ति भेटल। ओहि समय ओकर मूल्य मात्र दस पाई रहै। फेर आगा लाई-मुरही किनलौंह। ओहि समय पन्नी (पॉलीथिन) नै भेटय, तs शर्ट के नीचा सँ आधा बटन खोलि ओहि में लाई-मुरही लेलौं। बायाँ हाथ सँ घिरनी आ शर्ट पकड़ने आ दाहिना हाथे लाई-मुरही खाई के जे आनंद छल से आई काल्हि कुनो फाइव स्टार होटल में सेहो नै। मेला देखैत, पोखड़ि के दक्षिणवारि भीड़ पर नाच होइत रहै, से सब देखैत साँझ भs गेल। घुमि फिर मंदिर लग एलौं तs माँ बाबूजी भेटलाह।