ब्राह्मण आ मैथिल ब्राह्मणक संछिप्त इतिहास

१७ पुष २०२६, बिहीबार ००:००
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लेख

– कुमुद मोहन झा, विराटनगर

ब्राह्मण

परिभाषाः

ब्राह्मण हिन्दू वर्ण व्यवस्था के सर्वोच्च वर्ण । यस्क मुनि के निरुक्त अनुसार “बह्म जानाति ब्राह्मणः” अर्थात् ब्रह्म केँ जानयबाला ब्राह्मण कहबैत छथि । ब्रह्म अर्थात अन्तिम सत्य वा परम ज्ञान के ज्ञाता । ब्राह्मण के प्रत्येक सम्प्रदाय वेद सँ प्रेरणा लैत अयलाह अछि । पारम्परिक रुप सँ ई विश्वास अछि जे वेद अपौरुषेय अर्थात कुनु देवता, दानव वा मानव द्वारा लिखित नहि अपितु अनादि थीक । बल्कि ई कहू जे वेद अनादि सत्य के प्राकट्य थीक जकर बैधता शाश्वत अछि ।

उत्पत्तिः

सृष्टि के रचयिता जखन ब्रह्माण्ड के रचनाक परिकल्पना कयलन्हि आ एकर सभ अवयव के रचना करय लगलाह तऽ ओ अप्पन मुंह सँ वेद आ ब्राह्मण के उत्पत्ति कयलन्हि —“ ब्राह्मणोस्य मुखमासीद” । ई दुनु एहि सृष्टि के सर्वाधिक विलक्षण रचना छल जे मानव सभ्यता केँ मानवता सँ अलंकृत कयलक । ब्राह्मण के माध्यम सँ ज्ञान पर मानव मात्र के अधिकार स्थापित भेल जे मानव केँ अन्य जन्तु सँ पृथक बनयलक ।

सृष्टि के आरम्भिक काल सँ मनुष्य केँ मनुष्यता प्रदान करबाक उद्देश्य सँ विद्वान ब्राह्मण आचार्य लोकनि वेद शिक्षाक आरम्भ कयलन्हि । इएह शिक्षा “सूत्र” के नाम सँ जानल जाइत अछि । प्रत्येक वेद के विभित्र नाम सँ पृथक–पृथक शाखा बनय लागल । सभ वेद के अप्पन–अप्पन सूत्र अछि जे सामान्यतः पद्य वा मिश्रित गद्य–पद्य मे लिखल गेल अछि । उपरोक्त सूत्र सभ केँ मानव जीवनोपयोगी बनयबाक उद्देश्य सँ मुख्यतः तीन भाग मे लिखल गेल अछिः —

१. सामाजिक, नैतिक तथा शास्त्रानुकुल नियमबाला सूत्र केँ धर्म सूत्र कहल जाइत अछि ।
२. यज्ञ, अनुष्ठान आदि कर्म के नियमबाला सूत्र केँ श्रौत सूत्र कहल जाइत अछि ।
३. घरेलू विधिशास्त्र के ब्याख्या करयबाला सूत्र केँ गृह्य सूत्र कहल जाइत अछि ।

उपरोक्त सूत्र सभ सँ मानव केँ सुसज्जित कऽ एकटा सुन्दर समाज के सृजना कयल गेल । एहेन समाजक सृजना जाहि सिद्धान्त के आधार पर कयल गेल ओ थीक ब्राह्मणवाद । अस्तु, ब्राह्मणवाद जन जीवनक ओ संजीवनी थीक जे ओकरा सभ्य बनाओलक । एवं प्रकारेँ आदि काल सँ मानव समाज केँ मर्यादित, अनुशासित आ विवेकशील बनयबाक दायित्व ब्राह्मण समाज निर्वहण करैत अयलाह अछि ।

विस्तारः

बीतैत कालखण्ड सँग जखन जनसंख्या मे उत्तरोत्तर बृद्धि होमए लागल आ सम्पूर्ण भू मण्डल पर मनुष्य पसरि गेल तखन ब्राह्मण समाज केँ सेहो मानव कल्याणार्थ दशो दिशा मे अप्पन निवास स्थान बनबय पडल । भिन्न–भिन्न भौगोलिक अवस्थिति मे जलवायु के विविधता के कारण मानवीय जीवन शैली मे सेहो विविधता आबय लागल । एहि विविधता के विशिष्टता केँ परिभाषित करबाक उद्देश्य सँ ब्राह्मण समाज के दू भाग मे विभाजित कयल गेल । सनातन हिन्दू के निवास स्थान आर्यावर्त के मध्य भाग बिन्ध्य पर्वत केँ मानि उक्त पर्वत के उत्तर दिशा मे निवास करयबाला गौड आ दक्षिण दिशा मे निवास करयबाला द्रविण ब्राह्मण के नाम सँ परिचित भेलाह ।

बिन्ध्य पर्वत उत्तर आ दक्षिण दुनु दिशा मे बहुत विस्तृत भू भाग अछि । एहि दुनु भाग पर फैलि केँ बसोबास करयबाला आचार्य ब्राह्मण लोकनि धर्मानुकुल भिन्न–भिन्न संस्कृति, परम्परा, भाषा आदि के विकास करय लगलाह । एहि साँस्कृतिक आ भाषिक विविधता केँ परिष्कृत रुप सँ परिभाषित करबाक उद्देश्य सँ उपरोक्त द्राविण आ गौड ब्राह्मण केँ पुनश्च पाँच–पाँच भाग मे विभाजित कयल गेल जे निम्नानुसार अछिः

क. पञ्च द्राविण ब्राह्मण
१. कर्नाटक २. तेलंगा ३. द्राविण ४. महाराष्ट्र ५. गुर्जर

ख. पञ्च गौड ब्राह्मण
१. सारस्वत २. कान्यकुब्ज ३. गौड ४. उत्कल ५. मैथिल

एखनहुं ब्राह्मण समाज मूलतः उपरोक्त दश भाग मे विस्तृत भऽ सम्पूर्ण भू मण्डल पर निवास करैत छथि । उपरोक्त सम्पूर्ण ब्राह्मण यद्यपि उच्च, आदरणीय एवं पूज्य छथि तथापि पूर्व कालहिँ सँ मैथिल ब्राह्मण केँ विशेष पूजनीय एवं आदरणीय मानल गेल अछि कारण मिथिला सदा सँ तपस्वी ब्राह्मण के निवास स्थान रहल अछि । एतय के प्रत्येक व्यवहार धर्म सिद्ध छैकः “धर्मस्य निर्णयो ज्ञेयो मिथिला व्यवहारतः” ।

मैथिल ब्राह्मणोत्पत्तिः

प्राचीन काल मे काशी के ईशान दिशा मे अंग देश के समीप वैवश्वतमनु के पुत्र इक्ष्वाकु आ ओकर बाद इक्ष्वाकु के पुत्र निमि एकटा विस्तृत भू–खण्ड के प्रतापी सम्राट भेल छलाह । एहि राजकुल के कुलगुरु पुरोहित मुनि वशिष्ठ छलखिन । राजा निमि मोक्ष के अभिलाषा राखि एकटा यज्ञ करबाक निर्णय लेलन्हि । शुभ मुहुर्त निकालि तैयारी आरम्भ भेल । अहि बीच इन्द्र द्वारा कयल गेल एकटा यज्ञ मे भाग लेबाक हेतु वशिष्ठ केँ स्वर्ग जाय पडलन्हि आऽ ओ निमि के यज्ञारम्भक बेला धरि घूरि के नहि आबि सकलाह । राजा निमि के यज्ञ शुभ मुहुर्त मे आरम्भ करबाक छलैन्हि। ओ असमञ्जस के अवस्था मे अप्पन राज्य के विद्वान ब्राह्मण सभ केँ आमन्त्रित कऽ यज्ञ सम्पादनक हेतु अनुरोध कयलखिन । बहुत विचार विमर्शक पश्चात ऋषि गौतम के आचार्यत्व मे यज्ञारम्भ भेल । यज्ञ के समाप्तिक बेला मे कुलगुरु वशिष्ठ स्वर्ग सँ ओतय आबि गेलाह आऽ ई देखि जे हमरा अनुपस्थिति मे यज्ञ सम्पादन भऽ गेलै, अत्यन्त क्रोधातुर भऽ गेलाह । ओ राजा निमि केँ शाप दैत कहलखिन जे हमरा यज्ञ मे आचार्यक अभिभारा दऽ हमर अनुपस्थिति मे अहाँ यज्ञ करबाक जे घोर अपराध कयलहुं तकर परिणामस्वरुप मृत्यु केँ वरण करू ।

एहि प्रकारें शापित भऽ राजा निमि बहुत दुःखित भेलाह सँगहि हुनको शरीर मे क्रोधाग्नि तरंगित होमए लागल । ओ गुरु वशिष्ठ केँ कहलखिन जे यज्ञ मे आचार्य के अभिभारा स्वीकार कऽ अहाँ स्वयं समय पर उपस्थित नहि भेलहुं आ जखन अयलहुं तखन यज्ञ मे बिघ्न उत्पन्न करैत हमरा शापित कऽ देलहुं । अहाँक मति भ्रान्त भऽ गेल अछि तदर्थ हमहु अहाँके शाप दैत छी जे अहुं तत्काल मृत्यु केँ वरण करू । एहि तरहें राजा निमि आ गुरु वशिष्ठ एक दोसर सँ शापित भऽ अप्पन–अप्पन शरीर केँ त्यागि देलन्हि ।

पश्चात ब्रह्मा के आर्शीवाद सँ वशिष्ठ केँ पुनर्जीवन प्राप्त भेल आऽ ओ कुम्भ (घैला) सँ पुनः उत्पन्न भेलाह । राजा निमि के उत्तराधिकारी नहि छल, सम्पूर्ण राज्य शोकाकुल भऽ गेल । यज्ञ मे उपस्थित ब्राह्मण लोकनि राजा के मृत्युक कारण स्वयं के मानय लगलाह । ई घटना हुनका सभ केँ अपमान आ आत्मग्लानि के बोध सँ दुखिःत करय लागल । एहेन अवस्था मे ओहि यज्ञ मे उपस्थित विद्वान ब्राह्मण लोकनि सर्वश्रेष्ठ आ अद्वितिय वैज्ञानिक प्रयोग करैत राजा निमि के मृत शरीर केँ यज्ञ कुण्ड पर राखि अप्पन विद्या शक्ति आ मन्त्र शक्ति सँ मन्थन करय लगलाह । अंततः ओहि यज्ञ कुण्ड सँ दिव्य देहधारी एकटा बालक के आविर्भाव भेल । ब्राह्मण श्रेष्ठ आचार्य लोकनि आहि बालक केँ तीनटा नाम प्रदान कयलन्हि

१. यज्ञ सँ उत्पन्न होएबाक कारण प्रथम नाम जनक
२. कोनो देहधारी के बिना जन्म लेबाक कारण दोसर नाम विदेह
३. शरीर के मन्थन सँ उत्पत्र होएबाक कारण तेसर नाम मिथि ।

यज्ञ सँ उत्पन्न एहि अलौकिक राजा के नगर जनकपुर आ राज्य मिथिलाक नाम सँ पश्चात प्रसिद्ध भेल । उपरोक्त शरीर मन्थन कार्य मे संलग्न सभ श्रेष्ठ ब्राह्मण केँ ससम्मान मिथिला राज्य मे बसाओल गेल । ओएह श्रेष्ठ आचार्य लोकनि मैथिल ब्राह्मण के प्रथम पुरुखा वा बीजी पुरुष भेलाह । विदेह केँ यज्ञाग्नि सँ उत्पत्र करयबाला मुख्यतः १९ गोट ब्राह्मण श्रेष्ठ छलाह जिनका नाम सँ मैथिल ब्राह्मण समुदाय के गोत्र प्रचलित अछि । साधारण भाषा मे गोत्र कुनु व्यक्ति के ओहि निकटतम पूर्वज के नाम थीक जिनकर नाम सँ हुनकर सन्तति सम्बोधित होइत अछि । मैथिल ब्राह्मणक ओहि श्रेष्ठ पूर्वज सभ के नामावली निम्नानुसार अछिः

१. शाण्डिल्य २. कश्यप ३. परासर ४. वत्स ५. कात्यायन ६. भारद्वाज ७. सावर्णय ८. ताण्डि ९. गौतम १०. वशिष्ठ ११. कपिल १२. गर्ग १३. कौशिक १४. उपमन्यु १५. मौदगल्य १६. कौण्डिल्य १७. अलाम्बुकाक्ष १८. कृष्णात्रेय १९. विष्णुबृद्धि ।

सम्पूर्ण आर्यावर्त के ब्राह्मण सभ मे ज्ञान विज्ञान के सर्वोच्च शिखर पर बैसल मैथिल ब्राह्मण राजनैतिक क्षेत्र मे सेहो अग्र स्थान पर रहलाह अछि । अप्पन राज्य, राजधानी आ सेना बना पीढी दर पीढी सैकडौं वर्ष धरि राजाक रूपमे शासन करबाक श्रेय मात्र मैथिल ब्राह्मण केँ जाइत अछि । एहेन ज्ञानयोगी आ कर्मयोगी पूर्वज केँ शत शत नमन ।