“नादानी भरल उम्र में समय के सिखैल परिपक्वता”

१७ पुष २०२६, बिहीबार ००:००
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वंदना चौधरी।                       

#लघुकथा
#मधुश्रावणीपावैन ।

कैल्ह पावैन छियै आ एखन तक किछु भार नै एलै ,आय गौरी सेहो बनथिन ,और कलहुका सबटा ओरीयान सेहो आइए करय पड़तै ,ई कहैत सुनयना अहि घर स ओई घर ,समान सब सरियबै में व्यस्त छेली।
एतबा में वैदेही घर स बाहर भेली ,तूँ कथी ले एतेक चिंता करै छिहि गई माँ सबटा भ जेतै । लाल काकी के कही न ओ सबटा क देथुन ।
आ कि सुनयना कनि तमसा क बजली ,हं हं सबटा क देथिन मुदा पाय वला काज त पाइये स हेतै।

वैदेही : त बाबूजी के किये नै कहै छिहि ,पाय लेल।
सुनयना : कोना क कहबैन ,ओ कि आब देह बेच लेथुन । दू मास पहिने तोहर विवाह भेलौ , जे पाय जमा रहैन और जे जमीन जथा सबटा लक ,तोहर विवाह खूब नीक स सम्पन्न क देलखुन।
एखन त ककरो स मंगबो करबै त नै देते कियो ,कारण पहिने वला एखन तक नै चुकेलखिन ।
शगुन स ल क आ दुरागमन तक में तोहर सासुर के लोक के डिमांड पूरा करैत करैत ,भिखमंग भ गेलखुन तोहर बाबूजी , आ ताहि पर स पीठे पर ई पावैन सब । अहि पावैन में त सबटा वरे के घर स अबैत छै ।
तोहर सासुर वला सब खाली ल अक्षर चिन्है छेथिन ,द अक्षर स भेंटों नै छैन्ह बुझि पड़ेये ।
वैदेही मुँह लटकोउने ठाढ़ ,निर्दोष भाव स माय के सब बात जखन सुनि लेलक त ,धीरे से बाजल ,माँ तूँ कनियों चिंता नै कर ,हमरा बक्सा में एखन बहुत नव साड़ी सब ओहिना धेल अछि ,और गहनों सब अछियै ,हम वैह पहिर क पूजा क लेबौ ,फल मधुर सब सेहो कनि मनी स काज चला लेबै ,विषहरी कोनो बेसी थोड़े कहै छेथिन चढ़बै लेल ।
सुनयना दुनियांदारी स बेफिक्र और मासूम बेटी के भरि पांज पकड़ि क छाती स सटा लेली ,ई कहैत जे तूँ कहिया एतेक पैघ भ गेलही गई हमर बकलेलही बेटी । विषहरी तोरा खूब सोहाग भाग देथुन , तूँ ठीके कहै छिहि सबटा ओरीयान भ जेतै गई हमर बाबू । तूँ चिंता नै कर।
एतबा में वैदेही के संगी सहेली सब आँगन में आबि क ठाढ़ छेलैथ ,फुललोढ़ी ले जाय लेल ।
सब बात स अनजान ओ अबोध ,आ मासूम विदा भ गेल हँसैत खेलाइत फुललोढ़ लेल ।