“नवविवाहिता के सबसं पैघ पाबनि जाहि में तेसर बेर सिंदुर दान होईत अछि”

१७ पुष २०२६, बिहीबार ००:००
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अखिलेश कुमार मिश्रा।                 

“मधुश्रावणी”

सभ सँ पहिले मधुश्रावणी शब्दक अर्थ बुझु। मधुश्रावणी दू शब्दक जोड़ सँ बनल अछि। मधु मतलब शहद आ श्रावणी अर्थात सावन में। सभ मिला कs ई बात भेल जे, जे काज या त्यौहार सावन में हो या मधु जेकाँ मीठ अर्थात मधु जेकाँ प्रिय हो, ओ भेल मधुश्रावणी। होबाको चाही। सभ सँ बेसी बिरह तs ऐह दू मास में सतबैत अछि, चाहे ओ मधुमास (वसंत) हो या सावन हो। मिथिलाक जे भौगोलिक स्थिति अछि ताहि में सावन बेसी पीड़ादायक अछि (बिरह कें दृष्टिकोण सँ)। तs अप्पन सभक पूर्वज अहि स्थिति सँ निपटs के लेल सावन में एक त्यौहार एहेन कs देलैथि जाहि में नवदम्पति चौदह पंद्रह दिन के लेल साथ ही रहैथि। हमरा हिसाबे तs ई व्यवहारिक दृष्टिकोण भेल। आब एक्कर धार्मिक महत्ता बुझल जाव।
मधुश्रावणी त्यौहार सावन महिनाक शुक्लपक्षक तृतीया तिथि कs मनाओल जाइत अछि। मुदा नवदम्पति के लेल अहि पूजाक आरम्भ सावन के कृष्णपक्षक पंचमी सँ ही आरम्भ भ जाइत अछि। मिला जुला कs कुल चौदह दिनक ई पूजा होइत अछि। कुनो कुनो बेर तेरह वा कुनो बेर पन्द्रह दिनक सेहो भs जाइत अछि। मुदा चौदह दिनक चौदह अलग कथा कें प्रावधान अछि, तैं चौदह दिन ही मानू। पूजा जे पंचमी दिन सँ आरम्भ होइत अछि ओहि में गौरी, गणेश, शंकर आ विषहरि के पूजा अछि। विषहरि मतलब पाँच नागिन कें रूप छैन्ह जिनका मिथिला में माता गौरी के पुत्री मानल गेल अछि। ई पूजा विशेष अहि लs कs जे मिथिलांचल में सावन में सौँसे पानि भरि जाइत तs सर्प आ सर्पदंशक प्रकोप सेहो बढ़ि जाइत अछि। तैं हुनकर पूजाक अलग महत्व।
पंचमी दिन सँ आरम्भ पूजा में नव विवाहिता भोर में गौरी आ अन्य सभ कें पूजा करै छैथि आ दिन में कथा सुनलाक बाद सजि-संवरि कs सखी सभ संगे फूल लोढ़s लेल जाइ छैथि। वैह बसिया फूल पात सभ सँ अगिला दिन पूजा होइत अछि। अहि बीच में सभ दिनक खाना पूर्णतया सासुर के अन्न ही होइत अछि आ वस्त्र सेहो सासुर के ही रहैत अछि। ई चौदह पंद्रह दिन पूजा में नवविवाहिता (मतलब जिनकर विवाहक प्रथम वर्ष छैन्ह) अप्पन नैहर में ही रहैत छैथि। प्रत्येक दिन गीत, हास परिहास सँग पूजा, सभ दिनक कथा अलग अलग अलग होइत अछि। गौरीक पूजन मुख्यतया माटिक बनल हाथी के ऊपर कैल जाइत अछि जे अत्यंत शुभकारी मानल गेल अछि जे पति कें ज्यादा उम्र के लेल होइत अछि।
अन्तिम दिन अर्थात मधुश्रावणी दिन नवकनियाँ अप्पन वर आ विधिकरी सँग पूजा करै छैथि। विवाह, चतुर्थी के बाद वर के द्वारा पुनः एक बेर सिंदूरदान होइत अछि। एक्कर बादे ही विवाह कें पूर्ण मानल गेल अछि। तदुपरान्त कनियाँ ठेहुन के ऊपर पानक पात राखि ऊपर सँ दीपक टेमी सँ हुनका तीन बेर दागल जाइत अछि। जे कनि कष्टकर तs अछि मुदा नवकनियाँ अप्पन उमंग में कष्ट साफे बिसरल रहैत छैथि। मान्यता तs ई अछि जे, जेक्कर फोंका जतेक पैघ तिनका वर ओहिना बेसी मान्थिन्ह। दिन-राति अनुने भोजन कैल जाइत अछि। अहि दिनक पूजा में वरक सिर्फ सहभागिता ही रहैत अछि। सभ विधि खाली कनियाँ ही करै छैथि। अहि दिन नवकनियाँक अतिरिक्त जे सधवा स्त्री छैथि सेहो अनुना राखै छैथि आ गौरीक पूजन करै छैथि। पंचमी आ मधुश्रावणी में वर ओतय सँ कनियाँ ओतय भारs सेहो आबैत छैन्ह। खास कs मधुश्रावणीक भार में तs कनियाँ पक्षक नजदीकक सम्बन्धी तक लेल कपड़ा (सिर्फ स्त्रीगण लेल) सेहो आबैत छैन्ह।
अहि त्यौहारक तs खासियत ऐह अछि जे एक संदर्भ सँ बुझु। हमरा विवाह वर्ष नव नौकरी के चलते छुट्टी के कमी रहै। नौबत एहेन रहै जे अगर मधुश्रावणी में दिल्ली सँ गाम जायब तs कोजागरा में गाम गेनाइ मुश्किल। तs हम अहि बारे में अप्पन बड़का भाइजी सँ पुछलौं जे की करी। ओ कहला जे बेसक अहाँ कोजागरा में गाम नै जैब तs कुनो बात नै, मुदा मधुश्रावणी में अवश्य जाउ।
🙏🙏🙏इति🙏🙏🙏