जितेन्द्र जीतूक कविता “लाज”

१७ पुष २०२६, बिहीबार ००:००
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कविता
– जितेन्द्र जीतू
लाज

चंदा मामा क, आरे पारे
नदिया किनारे बजेवाक जिद्द
कहाँ करैत छै ओ ?
सोनाक कटोरिया मे
दूधो भातक लालसा,
नहि छै ओकरा ।
ओ त भैया-बाबू क आइँठे स’
चुपचाप पेट भरि लैत छै अपन ।
 
ओ जिद्द कहां करैत छै खेलौनाक लेल
आ खेलेबाको जिद्द कहाँ ?
खपटा खुपटी,
आ कनिया पुतरा सन खेल,
खेल कहाँ..?
जिनगियै बनि जायत छै ओकर ।
 
नहि कोनो ईच्छा,
नहि आकांक्षा
नहि कोनो उलहन
नहि उपराग,
नहि अपन जीवने सँ कोनो कुण्ठा ।
 
जनमैतहि ज्ञात रहैत छै ओकरा
ओकर जीवनक प्रत्येक पन्ना पर
एक्कहि टा शब्द लिखल अछि –
असम्भव !!!
 
कियाक त ..
ओ बेटी छियै,
ओ बहिन छियै,
ओ पत्नी छियै,
ओ प्रेमिका छियै,
ओ माय छियै…..
ओ स्त्री छियै……
हँ ओ स्त्री छियै ।
 
एकटा स्त्रीक की दोष…??
की, स्त्री भेनाइ पाप छियै त…??
कखनो संस्कार आ परम्पराक बेड़ी
त कखनो लाजक परिबन्ध..
आखिर कियाक…??
 
लाज, कखनहुँ आँखिमे
त कखनो अन्तरात्मा सँ होयत छै ।
लाज कखनो स्वयं सँ
त कखनो समाजसँ होयत छै ।
 
लाज स्वयंकेँ स्वयमस’ दण्डित करबाक
आत्म न्यायके मापदण्ड छियै ।
लाज दोसरके लक्षित क’
ओकर उन्नतिक बाधित कर’ वला हथियार कियाक…?
 
आखिर लाजक परिभाषा की….??
ईर्ष्या…?
कुण्ठा…..?
आक्रोश ….??
नहि कदापि नहि….
 
लाज त स्वयंमके संस्कारमे बान्ह’ बला
एकटा आदर्श बन्धन छियै ।
हँ आदर्श बन्धन,
बाध्यता, कथमपि नहि…..
 
लाज तखन होयत अछि,
जखन लोक लाजक परिबन्ध
ओकरा शिक्षा सँ बंचित करैत अछि
लज्जाक जाल बूनि
ओकर आत्मनिर्भरता मे बाधा करैत अछि
लाज तखन होयत अछि
जखन ओकरा कमजोर करबाक कुचेष्टा होयत अछि ।
लाज तखन होयत अछि, जखन
बेटी/बहिन बलात्कृत होयत अछि,
 
लाज तखन होयत अछि जखन
गर्भहि मे लिंग पहिचान क’
असंख्य बेटीक भ्रूण निर्ममतासँ नष्ट क’ देल जायत अछि..
लाज तखन होयत अछि जखन
दहेजकलेल नित्य पत्नी/पुतोहु ऊपर अत्याचार होयत अछि.
पीड़ा आ कुण्ठाक विच
जखन एकटा बेटीके
आत्महत्याक बाध्यता देखैत छी तखन,…
ठीके, तखन लाज होयत अछि ।